गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता भगवान गणेश के जन्मोत्सव का पर्व है। परिवार प्रतिमा घर लाते हैं, एक दिन या कई दिन उसकी पूजा करते हैं और फिर भजन-कीर्तन व कृतज्ञता के साथ विसर्जन करते हैं। यह पर्व महाराष्ट्र में सबसे भव्य रूप से मनाया जाता है, पर पूरे भारत और विदेश के घरों में भी मनाया जाता है।
मुख्य बातें
- गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को पड़ती है। प्रतिमा 1.5, 3, 5, 7 या 10 दिन रखी जाती है और विसर्जन अधिकतम अनंत चतुर्दशी तक होता है।
- स्थापना पंचांग में बताए गए मध्याह्न मुहूर्त में की जाती है।
- मिट्टी (शादू मिट्टी) की प्रतिमा परंपरागत और पर्यावरण के अनुकूल है।
- मोदक और दूर्वा घास पारंपरिक भोग हैं। गणेश पूजा किसी भी दिन भी की जा सकती है, विशेषकर किसी अन्य अनुष्ठान से पहले।
प्रतिमा का चयन
- प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा चुनें जिसमें पौधों से बने रंग हों। यह आसानी से घुल जाती है और जल स्रोतों को हानि नहीं पहुँचाती।
- परंपरा के अनुसार सूँड बाईं ओर मुड़ी हो और प्रतिमा बैठी मुद्रा में हो। आकार मायने नहीं रखता, घर की पूजा के लिए छोटी प्रतिमा पूरी तरह पर्याप्त है।
- स्थान घर का स्वच्छ, शांत कोना हो, यथासंभव पूर्व या उत्तर की ओर मुख, और ऊँचे आसन पर लाल या पीला वस्त्र बिछा हो।
स्थापना की तैयारी
- घर और पूजा स्थान स्वच्छ करें। पुष्प, आम के पत्तों का तोरण और रंगोली से सजाएँ।
- लकड़ी या स्वच्छ वस्त्र से ढका चौकी रखें। उस पर चावल या गेहूँ बिछाकर प्रतिमा स्थापित करें।
- प्रतिमा के पास जल, आम के पत्तों और नारियल सहित कलश रखें।
- पूजा शुरू करने से पहले सामग्री सजाकर रखें, पूजा के बीच में खोजनी न पड़े।
सामग्री
- दूर्वा घास (21 गुच्छे, प्रत्येक में तीन पत्तियाँ)
- लाल गुड़हल के पुष्प और अन्य पुष्प
- मोदक, लड्डू, फल और नारियल
- रोली, अक्षत, चंदन, हल्दी, कुमकुम
- धूप, कपूर, घी का दीपक, पान के पत्ते और सुपारी
- जनेऊ और प्रतिमा के लिए नया वस्त्र
हमारी गणेश पूजा किट में ये सब एक साथ मिल जाता है।
पूजा विधि
- संकल्प: परिवार के कल्याण के लिए गणेश जी की पूजा का संकल्प लें।
- प्राण प्रतिष्ठा: मंत्रों से प्रतिमा में दिव्य उपस्थिति का आवाहन किया जाता है। यह सामान्यतः पंडित जी करते हैं।
- षोडशोपचार (सोलह उपचार): आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा और प्रार्थना।
- दूर्वा और मोदक: "ॐ गं गणपतये नमः" का जप करते हुए दूर्वा और यथासंभव 21 मोदक अर्पित करें।
- आरती: "सुखकर्ता दुखहर्ता" या "जय गणेश देवा" गाएँ।
- प्रसाद: परिवार और पड़ोसियों में बाँटें।
अगले दिनों में ताज़े पुष्प चढ़ाएँ, दीप जलाएँ, सुबह-शाम आरती करें और प्रतिमा के स्थान को स्वच्छ रखें। प्रतिदिन फल या मिठाई का भोग लगाया जा सकता है।
चतुर्थी पर चंद्र दर्शन
एक पारंपरिक मान्यता है कि गणेश चतुर्थी की रात चंद्रमा देखने से मिथ्या कलंक लग सकता है, जो स्यमंतक मणि की कथा से जुड़ा है। इस परंपरा को मानने वाले परिवार उस संध्या चंद्रमा नहीं देखते। यदि अनजाने में दिख जाए, तो स्यमंतक कथा सुनने या पढ़ने की सलाह दी जाती है। यह आस्था और पारिवारिक रीति का विषय है।
विसर्जन, विदाई
निर्धारित दिन अंतिम पूजा और आरती के बाद "गणपति बाप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" के जयघोष के साथ विसर्जन करें। घर में मिट्टी की प्रतिमा को बड़े टब के पानी में विसर्जित किया जा सकता है और मिट्टी बैठ जाने पर पानी बगीचे में डाला जा सकता है। यदि जल स्रोत में विसर्जन करें, तो स्थानीय नियमों का पालन करें, केवल प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा रखें और पुष्प व सजावट पहले निकाल लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या प्रतिमा केवल डेढ़ दिन रख सकते हैं?
हाँ। कई परिवार डेढ़ दिन रखते हैं और कुछ 3, 5, 7 या 10 दिन, अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार।
क्या पंडित जी की आवश्यकता है?
आप सरल विधि से स्वयं कर सकते हैं, पर मुहूर्त और प्राण प्रतिष्ठा में पंडित जी सहायक होते हैं। आप गणेश पूजा के लिए पंडित बुक कर सकते हैं।
क्या गणेश पूजा अन्य दिनों में हो सकती है?
हाँ। हर अनुष्ठान में सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है, और अनेक परिवार बुधवार, संकष्टी चतुर्थी या गृह प्रवेश और विवाह से पहले गणेश पूजा करते हैं।
व्यक्तिगत मार्गदर्शन चाहिए?
सत्यापित आचार्य से बात करें, या सत्यापित पंडित जी के साथ अपने संस्कार की योजना बनाएँ।
