करवा चौथ विवाहित महिलाओं का एक दिन का व्रत है, जो परंपरा से पति की दीर्घायु और कल्याण के लिए रखा जाता है। यह सूर्योदय से पहले शुरू होता है और संध्या में चंद्रमा के दर्शन के बाद पूर्ण होता है। हाल के वर्षों में अनेक दंपति इसे साथ रखते हैं, प्रेम और साझा प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति के रूप में।
मुख्य बातें
- करवा चौथ पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को पड़ता है, दिवाली से कुछ दिन पहले।
- व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक चलता है, और भोर में सरगी नामक भोजन होता है।
- पूजा संध्या में होती है, फिर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
- यह उत्तर और मध्य भारत में व्यापक रूप से मनाया जाता है, और प्रवासी भारतीयों में भी बढ़ रहा है।
नाम का अर्थ
"करवा" टोंटी वाला छोटा मिट्टी का पात्र है, जिससे चंद्रमा को जल चढ़ाया जाता है, और "चौथ" का अर्थ चंद्र पक्ष की चौथी तिथि है। यह पात्र स्वयं पर्व का प्रतीक है, और अक्सर सजाया जाता है तथा मिठाई या छोटे उपहारों से भरा जाता है।
यह कब मनाया जाता है
यह पर्व पूर्णिमांत पंचांग में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है, जो अमांत पंचांग (पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कुछ भागों में प्रचलित) में आश्विन कृष्ण चतुर्थी कहलाती है। यह दिवाली से लगभग नौ दिन पहले पड़ता है। चूँकि चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए व्रत अलग स्थानों पर अलग समय पर खुलता है। हमारी गाइड विदेश में सही पंचांग देखें।
कथाएँ
- वीरावती: सबसे प्रचलित कथा वीरावती नामक नवविवाहिता की है जो अपने मायके में व्रत कर रही थी। उसके भाई उसे कष्ट में न देख सके और उन्होंने पेड़ के पीछे दीपक जलाकर झूठा चंद्रोदय दिखाया, और उसने व्रत खोल दिया। शीघ्र ही उसका पति बीमार हो गया। उसने आगे के वर्षों में श्रद्धा से व्रत दोहराया और वह स्वस्थ हो गया।
- करवा: लोक परंपरा की एक कथा करवा नामक पतिव्रता की है जिसकी आस्था ने उसके पति को मगरमच्छ से बचाया।
- द्रौपदी: महाभारत की परंपरा में जब अर्जुन हिमालय में थे, तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की सलाह पर व्रत रखा।
ये कथाएँ संध्या पूजा के समय सुनाई जाती हैं। इनमें भक्ति, देखभाल और पति-पत्नी के बंधन का भाव है।
सरगी, भोर का भोजन
अनेक परिवारों में सास सूर्योदय से पहले सरगी तैयार करती हैं: फल, मेवे, फेनी या मठरी जैसी मिठाइयाँ, और चाय या दूध, देखभाल और आशीर्वाद के उपहार के रूप में। महिला इसे भोर में खाती है ताकि दिन भर के लिए शक्ति रहे। सरगी दोनों परिवारों के बंधन का प्रतीक है।
संध्या पूजा और चंद्र दर्शन
संध्या में महिलाएँ उत्सव के वस्त्र, अक्सर लाल, पहनती हैं और चूड़ियों, बिंदी और मेहंदी के साथ पारंपरिक सोलह शृंगार करती हैं। वे करवा चौथ की कथा के लिए एकत्र होती हैं, गौरी (पार्वती), शिव, गणेश और कार्तिकेय का पूजन करती हैं और करवों का आदान-प्रदान करती हैं। चंद्रमा के उदय के बाद वे उसे अर्घ्य देती हैं, छलनी से चंद्रमा को और फिर छलनी से पति को देखती हैं। पति पहला घूँट जल और पहला निवाला देते हैं और व्रत खुलता है। विधि के लिए हमारी गाइड करवा चौथ पूजा विधि पढ़ें।
क्षेत्रीय स्वरूप
- पंजाब और हरियाणा: सास से सरगी, थाली का आदान-प्रदान और सामुदायिक सभाएँ।
- उत्तर प्रदेश और राजस्थान: विस्तृत कथा और सामूहिक पूजन।
- दिल्ली और प्रवासी समुदाय: सामुदायिक पूजा, छत से चंद्र दर्शन और उपहार।
आज यह कैसे बदल रहा है
- अनेक पति अब पत्नियों के साथ व्रत रखते हैं।
- अविवाहित महिलाएँ और सगाई वाले जोड़े भी कभी-कभी रखते हैं।
- स्वास्थ्य की समस्या, गर्भावस्था या लंबे कार्य दिवस वाले लोग फल या जल की अनुमति वाला रूप चुन सकते हैं, और अनेक परिवार इसे स्वीकार करते हैं।
पर्व का सार प्रेम और देखभाल है। यदि कठोर व्रत उपयुक्त न हो, तो अपने परिवार और पंडित जी से बात करें और सुरक्षित तरीका चुनें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या करवा चौथ केवल विवाहित महिलाओं के लिए है?
परंपरा से हाँ, पर आज सभी प्रकार के लोग इसे रखते हैं। यह परिवार की प्रथा पर निर्भर है।
क्या व्रत निर्जल होता है?
पारंपरिक व्रत बिना अन्न और जल (निर्जला) का है, पर स्वास्थ्य कारणों से अनेक लोग हल्का रूप रखते हैं।
यदि बादलों के कारण चंद्रमा न दिखे तो?
अनेक परिवार पंचांग का चंद्रोदय समय मानकर चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य देते हैं। अपनी परंपरा के लिए बड़ों या पंडित जी से पूछें।
व्यक्तिगत मार्गदर्शन चाहिए?
सत्यापित आचार्य से बात करें, या सत्यापित पंडित जी के साथ अपने संस्कार की योजना बनाएँ।

