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प्रदोष व्रत: अर्थ, पूजा विधि और उपवास के नियम

प्रदोष व्रत हर चंद्र मास में दो बार भगवान शिव को समर्पित है। जानिए प्रदोष काल क्या है, सायंकाल की पूजा कैसे होती है, क्या खाएँ और वार के अनुसार नाम क्यों बदलता है।

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SanskarSetu Team

प्रकाशित 8 अक्टू॰ 2026

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प्रदोष व्रत: अर्थ, पूजा विधि और उपवास के नियम

मुख्य बातें

  • प्रदोष शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि (13वीं तिथि) को पड़ता है।
  • पूजा प्रदोष काल में की जाती है, यानी सूर्यास्त के आसपास की संध्या में, सुबह नहीं।
  • व्रत का नाम वार के अनुसार होता है, जैसे सोम प्रदोष (सोमवार) या शनि प्रदोष (शनिवार)।
  • उपवास व्यक्तिगत निर्णय है। फल और दूध स्वीकार्य हैं, और वृद्ध या अस्वस्थ जन हल्का व्रत रख सकते हैं।

प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित पाक्षिक व्रत है। यह त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है और मुख्य पूजा संध्या के समय की जाती है। अनेक परिवारों के लिए यह वर्ष भर, महीने में दो बार, श्रद्धा की एक शांत और नियमित परंपरा है।

प्रदोष क्या है

प्रदोष शब्द सूर्यास्त के ठीक बाद के संध्याकाल को कहते हैं। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव भक्ति से विशेष प्रसन्न होते हैं। एक लोकप्रिय कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है: जब भयंकर हलाहल विष निकला, तब शिव जी ने लोकों की रक्षा के लिए उसे पी लिया और बाद में देवताओं तथा असुरों ने त्रयोदशी की संध्या में उनकी स्तुति की। कथा चाहे जिस रूप में कही जाए, यह दिन शिव जी को रक्षक के रूप में स्मरण करने का अवसर बन गया है।

प्रदोष व्रत कब रखा जाता है

व्रत तब रखा जाता है जब त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में विद्यमान हो। प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का समय है (अधिकांश पंचांग सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और बाद तक मानते हैं)। तिथियाँ अलग-अलग शहरों में अलग समय पर शुरू और समाप्त होती हैं, इसलिए तारीख में अंतर हो सकता है। अपने शहर का पंचांग देखें या हमारा लेख पंचांग कैसे पढ़ें पढ़ें।

प्रदोष जिस वार को पड़ता है, उसी नाम से जाना जाता है:

  • सोम प्रदोष (सोमवार), सोमवार शिव जी का दिन है
  • भौम या मंगल प्रदोष (मंगलवार)
  • शनि प्रदोष (शनिवार), जिसे शनि की कठिन दशा में राहत की भावना से अनेक लोग रखते हैं

प्रदोष व्रत की विधि

प्रातःकाल

  1. जल्दी स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. संकल्प लें, यानी शिव-पार्वती के लिए व्रत रखने का सरल निश्चय।
  3. शिवलिंग या घर के देवता पर जल चढ़ाएँ और दीपक जलाएँ।

सायंकाल, प्रदोष काल में

  1. पुनः स्नान करें या हाथ-पैर धोकर पूजा स्थान स्वच्छ करें।
  2. शिवलिंग का जल से अभिषेक करें, फिर दूध से, और चाहें तो दही, शहद, घी और शक्कर के जल से भी।
  3. बिल्वपत्र, सफेद पुष्प और चंदन या भस्म अर्पित करें।
  4. माला से "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
  5. प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  6. आरती करके प्रसाद बाँटें।

उपवास के नियम

  • कुछ भक्त संध्या पूजा तक निर्जल व्रत रखते हैं। अधिकांश परिवार फलाहार रखते हैं, यानी फल, दूध और हल्का सात्त्विक भोजन। अपने स्वास्थ्य के अनुसार चुनें।
  • इस दिन अन्न, प्याज, लहसुन और मांसाहार से बचें।
  • व्रत संध्या पूजा के बाद सादे भोजन से खोलें, या परिवार की परंपरा के अनुसार अगली सुबह।
  • गर्भवती महिलाएँ, वृद्धजन, बच्चे और किसी बीमारी से पीड़ित लोग कठोर उपवास न करें। श्रद्धा कष्ट से अधिक महत्वपूर्ण है।

संध्या पूजा की सामग्री

  • शिवलिंग या शिव जी की प्रतिमा, स्वच्छ थाली और छोटा तांबे या पीतल का लोटा
  • जल, कच्चा दूध, दही, शहद, घी और शक्कर
  • बिल्वपत्र, सफेद पुष्प, चंदन या भस्म
  • धूप, घी या तेल का दीपक, कपूर
  • फल और प्रसाद के लिए मिठाई

यदि आप पंडित जी के साथ विस्तृत अभिषेक करवाना चाहते हैं, तो हमारा लेख रुद्राभिषेक पढ़ें या यहाँ से बुक करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या स्त्री और पुरुष दोनों प्रदोष व्रत रख सकते हैं?

हाँ। यह हर आयु और लिंग के भक्त रखते हैं, और कई दंपति साथ में भी रखते हैं।

यदि संध्या का समय निकल जाए तो?

पूजा संध्या के जितना निकट हो सके, उतना निकट करें। सच्चे मन से की गई सरल पूजा भी न करने से श्रेष्ठ है। अपवादों के लिए पंडित जी से मार्गदर्शन लें।

कितने प्रदोष व्रत रखने चाहिए?

कुछ लोग हर प्रदोष रखते हैं, कुछ केवल सोम या शनि प्रदोष, और कुछ 11 या 26 प्रदोष व्रतों का संकल्प लेते हैं। यह निजी निर्णय है और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है।

व्यक्तिगत मार्गदर्शन चाहिए?

सत्यापित आचार्य से बात करें, या सत्यापित पंडित जी के साथ अपने संस्कार की योजना बनाएँ।

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